ग़ज़ल गंगा

Play with words to express Feelings and experiences of life.

बुधवार, 30 सितंबर 2015

ग़ज़ल(आगमन नए दौर का)

›
  ग़ज़ल(आगमन नए दौर का) आगमन नए दौर का आप जिसको कह रहे वो सेक्स की रंगीनियों की पैर में जंजीर है सुन चुकेहैं  बहुत किस्से वीरत...
4 टिप्‍पणियां:
मंगलवार, 22 सितंबर 2015

ग़ज़ल ( कैसे कैसे रँग)

›
ग़ज़ल ( कैसे कैसे रँग ) कभी अपनों से अनबन है कभी गैरों से अपनापन दिखाए कैसे कैसे रँग मुझे अब आज जीबन है ना रिश्तों की ही कीमत है ...
3 टिप्‍पणियां:
सोमवार, 31 अगस्त 2015

मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक १२ ,सितम्बर २०१५ में प्रकाशित

›
प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़ल जय विजय ,बर्ष -१ , अंक १२      ,सितम्बर २०१५ में प्रकाशित हुयी है . आप भी...
5 टिप्‍पणियां:
शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

एक साथ मेरी ग्यारह गजलें

›
एक साथ मेरी ग्यारह गजलें मदन मोहन सक्सेना
1 टिप्पणी:
मंगलवार, 18 अगस्त 2015

ग़ज़ल(इश्क क्या है)

›
ग़ज़ल(इश्क क्या है) हर सुबह रंगीन अपनी शाम हर मदहोश है वक़्त की रंगीनियों का चल रहा है सिलसिला चार पल की जिंदगी में ,मिल गय...
3 टिप्‍पणियां:
‹
›
मुख्यपृष्ठ
वेब वर्शन देखें

Play with words for expressing Feelings.out Me

मेरी फ़ोटो
Madan Mohan Saxena
Gazalkar
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें
Blogger द्वारा संचालित.