सोमवार, 15 अप्रैल 2013

ग़ज़ल(दीवारें ही दीवारें)


ग़ज़ल(दीवारें ही दीवारें)

दीवारें ही दीवारें नहीं दीखते अब घर यारों 
बड़े शहरों के हालात कैसे आज बदले है. 

उलझन आज दिल में है ,कैसी आज मुश्किल है 
समय बदला, जगह बदली क्यों रिश्तें आज बदले हैं 

जिसे देखो ,बही क्यों आज मायूसी में रहता है 
दुश्मन ,दोस्त रंग अपना, समय पर आज बदले हैं 

जब जीवन के सफ़र में जो पाया है सहेजा है 
खोया है उसी की चाह में ,ये दिल क्यों मचले है 

समय ये आ गया कैसा कि मिलता अब  समय ना है 
कि  रिश्तों को निभाने के अब हालात बदले हैं 



ग़ज़ल  प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना  
 

13 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत सुंदर रचना
    बधाई


    aagrah hai mere blog main sammlit hon

    उत्तर देंहटाएं
  2. नई स्थितियों के साथ पुरानी धारणायें बदलती जा रही है-समय का पहिया घूमेगा ही!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत व्यावहारिक बातें कही हैं आपने अपनी इस रचना के माध्यम से। बहुत-बहुत बधाई............

    उत्तर देंहटाएं
  4. रिश्तों को निभाने के अब हालात बदले हैं....................बहुत सुन्दर ग़ज़ल.

    उत्तर देंहटाएं
  5. दिलों के दरमीया है दीवार क्यू
    इक अमन के लिए इतनी तकरार क्यू
    बहुत उम्दा सर

    उत्तर देंहटाएं
  6. जब जीवन के सफ़र में जो पाया है सहेजा है
    खोया है उसी की चाह में ,ये दिल क्यों मचले है

    मिल जाये तो मिट्टी है को जाये तो सोना है ।

    समय ये आ गया कैसा कि मिलता अब समय ना है
    कि रिश्तों को निभाने के अब हालात बदले हैं

    सही कहा ।

    उत्तर देंहटाएं